मूर्तिकार की कहानी, हिन्दी कहानी, Motivational story

पुराने समय की बात है । एक नगर में एक प्रताप नाम का मूर्तिकार रहता था । वह इतनी सजीव मूर्ति बनाता था कि देखने वाले सोचते रह जाते थे कि यह मूर्ति है या सचमुच का प्राणी।

मूर्ति में बस प्राण – प्रतिष्ठा की कसर रह गई थीं। उसने देव – मन्दिरों , महलों तथा हवेलियों में लगने वाली मूर्ति भी बनाई थीं । वैसे वह अधिकतर राम , कृष्ण , शंकर , ब्रह्मा , विष्णु और प्रसिद्ध देवी देवताओं की मूर्तियाँ बनाता था । वह सोचता था कि अधिकतर लोगों को देवी देवताओं की मूर्तियों के दर्शन कराने चाहिए । क्योंकि देवी – देवता कृपा – दृष्टि रखते हैं और उनके दर्शन से मन में शान्ति आती है । मन और आत्मा पवित्र रहती , हैं।

एक दिन प्रताप ने, अपने नगर में मूर्तियों की प्रदर्शनी लगाई । उसने उसमें जीवन भर की कला को प्रदर्शित किया । एक से बढ़कर एक मूर्ति को उसने बड़े ही ढंग से सजाया । उस प्रदर्शनी को देखने के लिए हजारों व्यक्ति आने लगे । उन्होंने इतनी सुन्दर मूर्तियाँ कभी नहीं देखीं थी । वे मूर्तियों की भाव – भंगिमा और बनावट देखकर दाँतों – तलों उँगली दबाने लगे । भला क्या मजाल थी – जो कोई मूर्ति में रत्ती भर भी खोट निकाल दे । मूर्तियाँ क्या थीं , जीते – जागते देवताओं के सत्य स्वरूप थे ।

एक यक्ष सकेश नामक बड़ा ही मायावी था । वह भी मनुष्य के भेष में प्रदर्शनी देखने गया । देखते – देखते उसके मन में जाने क्या आया कि उसने अपनी माया से प्रताप को मुर्ति के रूप में बदल दिया। और यक्ष सुकेश ने प्रताप की मूर्ति की सबसे अधिक कीमत दी और उसे खरीद लिया । वह उसे अपने महल में ले आया और एक लोहे की सलाखों वाले कमरे में बंद कर दिया । कमरे की दीवारों को उसने अपनी माया की शक्ति से मोटे लोहे से ढक दिया ताकि प्रताप निकलकर भाग न सके ।

पहले दिन उसने प्रताप को मूर्ति के रूप में रखा और दूसरे दिन उसे असली रूप में बदल दिया । प्रताप ने अपने को यक्ष सुकेश की कैद में देखा तो वह बहुत चिन्तित हो उठा । उसने यक्ष से विनीत स्वर में कहा- ‘ यक्षराज ! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुमने मुझे यहाँ लाकर कैद कर दिया है । ‘ यक्ष ने उत्तर दिया- ‘ तू मूर्तियाँ बनाकर संसार भर में प्रसिद्ध होना चाहता है । मेरे होते हुए तू ऐसा कभी नहीं कर सकता । ‘ प्रताप बोला- ‘ यक्षराज ! हर कोई अपने – अपने ढंग से काम धंधा करके प्रसिद्ध होने की कामना करता है । मैं भी वही करता हूँ । मूर्तियों के द्वारा मैं तुम्हें कैसे हानि पहुँचा सकता हूँ । यह तो मेरा रोजगार है ।

तुमने मुझे यहाँ क्यों बन्द कर दिया है । मेरे बाल बच्चे भूखें मर जाएंगे । ‘ यक्ष बोला- ‘ तू मूर्तियों के द्वारा पृथ्वी पर रहने वाले स्त्री पुरुषों को बदलना चाहता है । मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगा । अब तू मेरे कक्ष में रहकर देवी देवताओं की मूर्तियाँ गढ़ेगा । मैं उन मूर्तियों में अपनी माया से शनिश्चर (यानि बुरी आत्मा) के प्राण भरता रहूँगा । यही मूर्तियाँ नगर – नगर बिकने के लिए जाएंगी , तब चारों ओर शनिश्चर (बुरी आत्मा) अपने कोप को फैलाएगा और लोगों की बुद्धि को भ्रष्ट कर देगा । ‘ प्रताप ने कहा- ‘ यक्षराज ! यदि आप ऐसा सोचते हो- तो लो

मैं आज से मूर्तियाँ ही नहीं बनाऊंगा । ” यह सुनकर यक्ष सुकेश बहुत खुश हुआ । उसने सोचा कि कुछ ही दिनों में प्रताप जब अपनी कला भूल जाएगा तो मैं इसे स्वतंत्र कर दूँगा । वह वहाँ से सोने के लिए चला गया । दूसरे दिन सुबह को वह सोकर उठा तो उसने ठक – ठक की आवाज सुनी । वह प्रताप के कक्ष में गया। उसने देखा कि मूर्तिकार माना करने के बाद भी मूर्तियाँ बना रहा है । यह देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । वह काफी देर तक उसे देखता रहा । फिर उसने मूर्तिकार से कहा- ‘ तुमने तो मूर्तियाँ बनाने के लिए इन्कार किया था ।

अब क्या सोचकर फिर मूर्तियाँ बनाने लगे ? ‘ प्रताप ने कहा- ‘ यह बात मैं कुछ दिनों के बाद बताऊँगा । ‘ इस पर यक्ष सुकेश बोला- ” ठीक है , अब तुम मुझे एक मूर्ति रोज बनाकर दोगे , जिस दिन मूर्ति नहीं बनेगी , उसी दिन मैं तुम्हारे शरीर से एक अंग काट लिया करूंगा । ‘ सुनकर मूर्तिकार डर गया । वह रोज एक मूर्ति तैयार करने लगा । यक्ष सुकेश आता और देवी देवताओं की मूर्ति में शनिश्चर (बुरी आत्मा) को बसा देता । फिर वह मूर्ति को लोगों के पास भेज देता । उसने सारे नगर में संकट का वातावरण उत्पन्न कर दिया था । क्योंकि मूर्तियों में बैठा शनिश्चर अपनी कुदृष्टि से उपद्रव फैलाता रहता था । प्रताप मन ही मन सोचता कि यक्ष नगर में शनिश्चर की कुदृष्टि का लाभ अवश्य उठा रहा होगा । पर वह क्या कर सकता था , विवश था । अन्त में उसके दिमाग में एक योजना आई । उसने सोचा कि यदि मैं उसमें संयुक्त हुआ तो यहाँ से छुटकारा पा जाऊँगा । जब एक दिन मरना ही है तो क्यों न सम्मान कि मौत मरा जाएँ । उसने छेनी हथोड़ा लिया और यक्ष सुकेश की मूर्ति तैयार करना

शुरू कर दिया । रात भर काम करने के बाद उसने यक्ष सुकेश को दूसरे दिन जब अपनी मूर्ति देखी तो वह चकित रह गया । मूर्ति तैयार कर दी । वह मन ही मन सोचने लगा कि सचमुच मूर्तिकार बड़ा ही होशियार है । लेकिन तभी उसके मन में एक दूसरा विचार आया । उसने आँखों में खून उतार कर प्रताप से कहा- ‘ मूर्ख मूर्तिकार , तूने मेरी मूर्ति क्यों बनाई । शायद तू मुझे नीचा दिखाना चाहता है । पर यह बात याद रख ! तू मेरा अपमान नहीं कर सकता ! ‘ प्रताप कहने लगा- ‘ यक्ष महाराज ! मैंने इस मूर्ति में देवत्व का रूप भर दिया है । सब लोग आपको देवता समझने लगेंगे । ‘

यक्ष के चेहरे पर खुशी के भाव आये । उसने पूछा- ‘ बोल , इस मूर्ति को नष्ट कर दूँ , या नगर में भेज दूं । ‘ प्रताप बोला- ‘ अपनी इस मूर्ति को तुम न तो नष्ट करो और न नगर को भेजो । इसे अपने मंदिर में उस तोते के पास रख दो , जो कुबेर की मूर्ति के पास पिंजरे में टंगा रहता है । ‘ यक्ष ने अपने रूप की मूर्ति को तोते के पिंजरे के सामने ले जाकर रख दिया । फिर वह वहाँ से चला गया । रात होने पर जब यक्ष सो गया तो प्रताप ने तोते से कहा- ‘ मैं जानता हूँ कि तू भी बोलना जानता है । पर बता तो सही – मूर्तिकार का क्या करूँ ? ‘ तोता के सामने यक्ष की हू – ब – हू मूर्ति रखी थी ।

अतः उसने सोचा कि वही उससे पूछ रहा है । इसलिए तोता बोला- ‘ मूर्तिकार तो बड़ा भला आदमी है । उसे तू छोड़ दे , वरना उसे पता चल गया कि मेरी जान मेरे भीतर है तो वह किसी दिन मुझे मार डालेगा । ‘ प्रताप ने जैसा सोचा था वैसी ही बात निकली । उसे पता चल गया कि यक्ष के प्राण इस तोते में हैं । पर प्रश्न यह था कि तोते को कैसे प्राप्त किया जाये । कुछ देर सोचने के बाद उसने तोते से कहा

‘ भले पक्षी बता , तू पिंजरे से बाहर भी आ सकता है या नहीं ? ‘ तोता बोला- ‘ तुम इस बारे में सब कुछ जानते हो । फिर क्यों ऐसा पूछ रहे हो ? ‘ तोता समझ रहा था कि मूर्ति के रूप में यक्ष बोल रहा है । प्रताप ने कहा- ‘ मैंने तो यों ही पूछ लिया था । ‘ सुनकर तोता हँस पड़ा फिर बोला- ‘ क्या यह भूल गये कि तुम दो बार ‘ शिवम् शिवम् ‘ करोगे तो मैं तुरन्त बाहर आ जाऊँगा । ‘ प्रताप शान्त हो गया । और वह रात उसने तोते को बिना छेड़े बिता दी ।

दूसरी रात को उसने तोते से कहा- ‘ शिवम् शिवम् ‘ आवाज सुनकर तोता उसकी ओर पिंजरे से निकलकर उड़ा । वह सीधा उसके भीतर आ गया । प्रताप ने उसे तुरन्त पकड़ लिया ।

और बिना समय गंवाए। तोते की गर्दन मरोड़ दी । तोता मर गया । उसके मरते ही यक्ष की भी मृत्यु हो गई । फिर देखते – देखते कवार वाली कारागार गायब हो गई । प्रताप ने अपने आपको एक सुन्दर महल में पाया । यक्ष का अन्त होते ही प्रताप खुशी – खुशी अपने घर को लौट गया । अब उसे किसी भी मायावी यक्ष का भय नहीं था ।

Motivational, Hindi Shayari

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